चुनावी मौसम में जिस वर्ग और समाज की सबसे ज्यादा बात होती है, वह है इस देश का वंचित समाज। यानी दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज। लेकिन चुनावी नतीजे आते ही सत्ता में आने वाले दल इन जातियों को हाशिये पर धकेल देते हैं। और सत्ता की सारा लाभ सवर्णों को मिलता है। मंत्री से लेकर बड़े अधिकारियों का पद इन्हीं को मिलता है औऱ दलित एवं आदिवासी समाज मुंह ताकता रह जाता है।

तकरीबन 23 फीसदी आदिवासी और 16.50 प्रतिशत दलित आबादी वाले मध्यप्रदेश में प्रशासन में भागेदारी के नाम पर झुनझुना थमा दिया गया है। प्रदेश के समाचार पत्र अग्निबाण ने एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है, जिसमें चौंकाने वाली बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 52 जिलों में से 33 कलेक्टर ऊंची जाति से हैं। जबकि ओबीसी के 13 कलेक्टरों हैं। दलितों और आदिवासियों की बात करें तो तकरीबन 23 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले मध्यप्रदेश के सिर्फ 2 कलेक्टर हैं, जबकि 21 फीसदी दलित समाज के 4 अधिकारियों के जिम्में कलेक्टर का पद है। थोड़ी और बारीकी से नजर डालने पर एक और चौंकाने वाली बात सामने आती है। प्रदेश में मध्यप्रदेश मूल का ओबीसी कलेक्टर सिर्फ एक है। तो वहीं मध्य प्रदेश मूल का एक भी आदिवासी अफसर कलेक्टर नहीं है। जबकि वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के 33 कलेक्टर हैं, जिसमें से 15 ब्राह्मण, 8 ठाकुर, 4 वैश्य और 6 अन्य जातियों के हैं। इस पूरे सिस्टम में सिर्फ एक मुस्लिम अफसर कलेक्टर का पद पा सका है।

 

 

यानी साफ है कि प्रदेश के 64 प्रतिशत कलेक्टर सामान्य वर्ग से हैं। जिनमें अकेले 30 फीसदी कलेक्टर ब्राह्मण अफसर हैं। जबकि ब्राह्मणों की जनसंख्या प्रदेश में महज 5-6 फीसदी ही है। तो वहीं 15 फीसदी ठाकुर और 8 फीसदी अफसर वैश्य हैं। अनुसूचित जाति वर्ग के 7 फीसदी और अनुसूचित जनजाति वर्ग के 4 फीसदी अफसर ही कलेक्टर हैं। खास बात यह भी है कि आरक्षित वर्ग के एक भी अफसर के पास कोई बड़ा जिला नहीं है। सिर्फ ओबीसी वर्ग के अफसर टी इलैया राजा जबलपुर के कलेक्टर हैं। यह तब है जबकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद ओबीसी समाज से आते हैं। यानी साफ है कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की बातें राजनीतिक दल सिर्फ वोटों के लिए करती हैं और सत्ता में आते ही मंत्रालयो से लेकर प्रशासन में ऊंची जाति के लोगों को बैठा दिया जाता है। दुख की बात यह है कि वंचित समाज सालों बाद भी इस साजिश को समझ नहीं सका है।