मुझमें जब से अंबेडकरी आंदोलन को लेकर चेतना आई है, तब से एक लंबा वक्त गुजर चुका है। शुरूआती सालों में इस आंदोलन को अपने से बड़ों के नजरिये से देखने के बाद बीते कुछ सालों में मैंने इस आंदोलन को अपने नजरिये से देखना शुरू किया तो कई सवाल मेरे सामने आएं। और इसमें सबसे बड़ा सवाल यह था कि जय भीम और नमो बुद्धाय के बीच संत शिरोमणि रविदास और संत कबीर क्यों छूट जा रहे हैं?
क्योंकि दलित-मूलनिवासी संतों महापुरुषों के बारे में पढ़ते हुए मुझे यह बात अक्सर परेशान करती थी कि जिन सतगुरु रविदास को संत शिरोमणि कहा जाता है और जो खुद एक चमार के घर जन्में थे, उनको लेकर दलित-मूलनिवासी समाज में बहुत उत्साह क्यों नहीं है। इस बारे में जब ज्यादा खोजबीन शुरू की और आसानी से उपलब्ध साहित्य को पढ़ा तो रैदास ब्राह्मणवादी खेमे में खड़े नजर आएं। मुझे निराशा हुई, क्योंकि तब तक एक बात तो साफ हो गई थी कि दलित-मूलनिवासी समाज को कभी भी ब्राह्मणवादी खेमे में खड़े किसी व्यक्ति या संत से बचना ही चाहिए। और जिन साहित्यों से मेरा पाला पड़ा था, उसमें रैदास उसी खेमें मे खड़े नजर आते थे। उन्हें रामानंद का शिष्य बताया गया था और ऐसी ही कई बातें थी, जिसके जरिए रैदास ब्राह्मणवाद के अनुयायी दिखते थे। ये बातें सामने आने के बाद संत रैदास को लेकर मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया।

 

लेकिन इसके बावजूद मुझे एक बात लगातार परेशान करती रही कि जो रविदास खुद को बार-बार चमार कहते रहे, जो कबीर के सामानांतर थे, जिन्होंने बेगमपुरा की परिकल्पना की, और जो अपनी लेखनी में अंधविश्वास पर कुठाराधात करते रहे, आखिर वह ब्राह्मणवाद के खेमें में कैसे खड़े हो सकते हैं। इसलिए संत रविदास को समझने के लिए जरूरी था, ऐसे लोगों का साहित्य पढ़ना, जो मनुवादी खेमे के न होकर अंबेडकरवादी खेमे के लोग हों। और इसी क्रम में चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु जी की सतगुरु रविदास पर लिखी पुस्तक का अंश पढ़ने को मिला। उन्होंने रविदास को ब्राह्मणवादी खेमे से निकाल कर एक स्वतंत्र विचारक और संत के रूप में खड़ा कर दिया था। उन्होंने ब्राह्मणवादियों द्वारा संत रविदास को लेकर रचे गए झूठ का पर्दाफाश अपने तर्कों से किया, जिससे साफ हो गया कि सतगुरु रविदास तो कभी ब्राह्मणवादी खेमें में थे ही नहीं, बल्कि उनको लेकर तमाम आडंबर और झूठ फैलाया गया और मूलनिवासी समाज खासकर रैदास के समाज की बाद की पीढ़ी के जागरूक लोगों को ब्राह्मणवादी खेमे में लाने के लिए ऐसा षड्यंत्र रचा गया। कँवल भारती जी और डॉ. मनोज दहिया जी की लेखनी ने भी रैदास को अलग तरीके से देखने का नजरिया दिया।

संत रविदास को और बेहतर समझने के लिए उनके लिखे को पढ़ना जरूरी है। आखिर कुछ तो रहा होगा कि उन्हें संत शिरोमणि कहा गया। आखिर कुछ तो रहा होगा कि मीरा सहित तमाम राजाओं ने उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया होगा। सिकंदर लोधी उनके सामने झुक गया। लेकिन यहां सवाल यह है कि जिस संत के ज्ञान के सामने उस दौर के तमाम बादशाहों ने खुद को नतमस्तक कर दिया, वह आखिर बाद के दिनों में आमजन के बीच उतने लोकप्रिय और जनप्रिय क्यों नहीं रह गए? और जिस पूर्वांचल में सतगुरु रविदास का जन्म हुआ, वहीं की जनता ने उनको इतना क्यों बिसार दिया। यहां तक कि जब बीते दिनों मैंने सीर गोवर्धनपुर की स्टोरी दलित दस्तक यू-ट्यूब पर चलाई तो कई लोगों ने मुझे फोन कर के जानना चाहा कि वह कहां है। हैरानी की बात यह रही कि उसमें से कई लोग उस जगह से महज 100 किलोमीटर के भीतर के लोग थे। ऐसे लोगों के बीच में संत रविदास के विचार उतनी पैठ क्यों नहीं बना सके? और रैदास पूर्वांचल से निकल कर उत्तर भारत के पंजाब के लोगों के बीच इतने लोकप्रिय कैसे हो गए?

 

बीते महीनों में मैं पंजाब स्थित जालंधर के डेरा सचखंड बल्लां और वाराणसी में सीर गोवर्धनपुर गया। डेरा सचखंड बल्लां, जहां के लोगों ने रविदासिया धर्म को बढ़ाया है, तो सीर गोवर्धनपुर वह जगह है जहां संत रविदास का जन्म हुआ। इन दोनों जगहों पर केंद्र में पंजाब के रविदासिया समाज के लोग थे। और साफ कहें तो पंजाब के चमार थे। डेरा सचखंड बल्लां हो या रविदास जन्मस्थान दोनों जगहों को यहीं के लोगों ने विकसित किया। क्योंकि पंजाब के रविदासी समाज के लोग दुनिया के कई हिस्सों में गए हैं, पैसा कमाया और अपने धर्म को अपने समाज के संत को सर माथे बैठाया। लेकिन ऐसा देश के दूसरे हिस्सों में नहीं हो पाया।
तो क्या संत रविदास बाबासाहेब आंबेडकर और फिर बुद्ध के बीच में कहीं खो से गए हैं? क्योंकि आज दलित समाज का हर कोई बाबासाहेब आंबेडकर को मानता है। बाबासाहेब आंबेडकर ने धर्म के नाम पर बौद्ध धम्म दिया, इस तरह बुद्ध वंचित समाज के जीवन में बतौर ‘ईश्वर’ आएं। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि जय भीम और नमो बुद्धाय के बीच सतगुरु रविदास क्यों छूट रहे हैं? सतगुरु रविदास हमारे समाज की धरोहर हैं। अपने उस महान पूर्वज को उनकी बातों को अगर हम नहीं बढ़ाएंगे, उन्हें अगर हम सम्मान नहीं देंगे तो फिर हमारे समाज की सांस्कृतिक विरासत पीछे छूट जाएगी।